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mahabharat 12.299.19: यद्यपि मैं सब प्रकार से पूर्ण हूँ (मुझे जानने या प्राप्त करने को कुछ शेष नहीं है), फिर भी मैं (संतों की संगति में) सज्जनों का भजन करता रहता हूँ। न तो मैं काम से ग्रस्त होता हूँ, न क्रोध से। मैं किसी वस्तु की प्राप्ति के लोभ से धर्म का उल्लंघन नहीं करता और न ही मैं सांसारिक सुखों की प्राप्ति के लिए कहीं जाता हूँ।॥19॥   |   mahabharat अध्याय 12.299: हंसगीता-हंसरूपधारी ब्रह्माका साध्यगणोंको उपदेश   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 299: हंसगीता-हंसरूपधारी ब्रह्माका साध्यगणोंको उपदेश  »  श्लोक 19
 
 
श्लोक  12.299.19 
सदाहमार्यान्निभृतोऽप्युपासे
न मे विधित्सोत्सहते न रोष:।
न वाप्यहं लिप्समान: परैमि
न चैव किंचिद् विषयेण यामि॥ १९॥
 
 
अनुवाद
यद्यपि मैं सब प्रकार से पूर्ण हूँ (मुझे जानने या प्राप्त करने को कुछ शेष नहीं है), फिर भी मैं (संतों की संगति में) सज्जनों का भजन करता रहता हूँ। न तो मैं काम से ग्रस्त होता हूँ, न क्रोध से। मैं किसी वस्तु की प्राप्ति के लोभ से धर्म का उल्लंघन नहीं करता और न ही मैं सांसारिक सुखों की प्राप्ति के लिए कहीं जाता हूँ।॥19॥
 
Although I am complete in all respects (I have nothing left to know or achieve), still I keep worshipping the noble men (in the company of saints). I am neither overcome by desire nor by anger. I do not violate Dharma out of greed to get something and I do not go anywhere for the attainment of worldly pleasures.॥ 19॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)