श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 298: पराशरगीताका उपसंहार—राजा जनकके विविध प्रश्नोंका उत्तर  »  श्लोक 8
 
 
श्लोक  12.298.8 
नाधर्म: कारणापेक्षी कर्तारमभिमुञ्चति।
कर्ता खलु यथाकालं तत: समभिपद्यते॥ ८॥
 
 
अनुवाद
अधर्म अपने फल भोगने के अवसर की प्रतीक्षा करता है, इसलिए वह कर्ता को अकेला नहीं छोड़ता। समय आने पर कर्ता को अपने पाप का फल भोगना ही पड़ता है ॥8॥
 
Adharma waits for the opportunity to bear its fruits, therefore it does not leave the doer alone. When the time comes, the doer has to suffer the consequences of his sin. ॥ 8॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)