श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 298: पराशरगीताका उपसंहार—राजा जनकके विविध प्रश्नोंका उत्तर  »  श्लोक 7
 
 
श्लोक  12.298.7 
नाधर्म: श्लिष्यते प्राज्ञं पय: पुष्करपर्णवत्।
अप्राज्ञमधिकं पापं श्लिष्यते जतुकाष्ठवत्॥ ७॥
 
 
अनुवाद
जैसे कमल के पत्ते पर जल नहीं लग सकता, वैसे ही बुद्धिमान मनुष्य पाप से लिप्त नहीं हो सकता; किन्तु जैसे लाख लकड़ी पर चिपक जाता है, वैसे ही अज्ञानी मनुष्य पर पाप अधिक चिपकता है ॥7॥
 
Just as water cannot smear the lotus leaf, similarly a wise man cannot be tainted by sin; but just as lacquer sticks to wood, similarly sin sticks more to an ignorant man. ॥ 7॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)