श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 298: पराशरगीताका उपसंहार—राजा जनकके विविध प्रश्नोंका उत्तर  »  श्लोक 6
 
 
श्लोक  12.298.6 
वसन् विषयमध्येऽपि न वसत्येव बुद्धिमान्।
संवसत्येव दुर्बुद्धिरसत्सु विषयेष्वपि॥ ६॥
 
 
अनुवाद
बुद्धिमान् पुरुष यदि सांसारिक भोगों के बीच में भी रहता है, तो भी वह उनसे विरक्त होने के कारण उनमें नहीं रहता; किन्तु जिसकी बुद्धि भ्रष्ट हो गई है, वह यदि सांसारिक भोगों के निकट भी न रहता हो, तो भी सदैव उनमें ही रहता है ॥6॥
 
A wise man, even if he lives in the midst of worldly pleasures, is as good as not being in them (due to being detached from them); but one whose intellect is corrupted, even if he is not near the worldly pleasures, he always lives in them. ॥ 6॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)