श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 298: पराशरगीताका उपसंहार—राजा जनकके विविध प्रश्नोंका उत्तर  »  श्लोक 44
 
 
श्लोक  12.298.44 
आस्तिक्यव्यवसायाभ्यामुपायाद् विस्मयाद् धिया।
समारभेदनिन्द्यात्मा न सोऽर्थ: परिषीदति॥ ४४॥
 
 
अनुवाद
जिसका हृदय उदार और विशाल है, जो श्रद्धा, निश्चय और आवश्यक विधियों से तथा अभिमानरहित होकर उत्तम बुद्धि से किसी कार्य को आरम्भ करता है, उसका कार्य कभी निष्फल नहीं होता ॥ 44॥
 
He whose heart is generous and broad, who begins a task with faith, determination, and the necessary methods and without any pride, with good intellect, his task never fails. ॥ 44॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)