श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 298: पराशरगीताका उपसंहार—राजा जनकके विविध प्रश्नोंका उत्तर  »  श्लोक 43
 
 
श्लोक  12.298.43 
अद्वैधमनसं युक्तं शूरं धीरं विपश्चितम्।
न श्री: संत्यजते नित्यमादित्यमिव रश्मय:॥ ४३॥
 
 
अनुवाद
जिसके मन में कोई संदेह नहीं है, जो परिश्रमी, वीर, धैर्यवान और विद्वान है, धन उसे सूर्य की किरणों की तरह कभी नहीं छोड़ता।
 
One who has no doubts in his mind, who is industrious, valiant, patient and learned, wealth never leaves him like the rays of the sun.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)