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mahabharat 12.298.4: जब कोई व्यक्ति अधर्म के बंधन को तोड़कर धर्म में लग जाता है और समस्त प्राणियों को अभयदान देता है, तो वह उसी क्षण परम सिद्धि प्राप्त कर लेता है ॥4॥   |   mahabharat अध्याय 12.298: पराशरगीताका उपसंहार—राजा जनकके विविध प्रश्नोंका उत्तर   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 298: पराशरगीताका उपसंहार—राजा जनकके विविध प्रश्नोंका उत्तर  »  श्लोक 4
 
 
श्लोक  12.298.4 
छित्त्वाऽधर्ममयं पाशं यदा धर्मेऽभिरज्यते।
दत्त्वाऽभयकृतं दानं तदा सिद्धिमवाप्नुते॥ ४॥
 
 
अनुवाद
जब कोई व्यक्ति अधर्म के बंधन को तोड़कर धर्म में लग जाता है और समस्त प्राणियों को अभयदान देता है, तो वह उसी क्षण परम सिद्धि प्राप्त कर लेता है ॥4॥
 
When a person breaks the bondage of unrighteousness and becomes devoted to righteousness and gives protection to all creatures, he at that very moment attains supreme success. ॥ 4॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)