श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 298: पराशरगीताका उपसंहार—राजा जनकके विविध प्रश्नोंका उत्तर  »  श्लोक 37
 
 
श्लोक  12.298.37 
विस्तरा: क्लेशसंयुक्ता: संक्षेपास्तु सुखावहा:।
परार्थं विस्तरा: सर्वे त्यागमात्महितं विदु:॥ ३७॥
 
 
अनुवाद
कर्मों का विस्तार दुःखदायी है और संक्षिप्तता सुखदायी है। सभी कर्म दूसरों के हित के लिए अर्थात् मन और इन्द्रियों की तृप्ति के लिए किए जाते हैं, परंतु त्याग अपने लिए ही हितकर माना गया है ॥37॥
 
The detail of the actions is painful and the brevity is pleasurable. All activities are done for the benefit of others i.e. for the satisfaction of mind and senses, but renunciation is considered beneficial for oneself. 37॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)