श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 298: पराशरगीताका उपसंहार—राजा जनकके विविध प्रश्नोंका उत्तर  »  श्लोक 36
 
 
श्लोक  12.298.36 
शरीरगृहसंज्ञस्य शौचतीर्थस्य देहिन:।
बुद्धिमार्गप्रयातस्य सुखं त्विह परत्र च॥ ३६॥
 
 
अनुवाद
जिसका शरीर ही घर है, जो आन्तरिक और बाह्य पवित्रता को तीर्थ मानता है और जो बुद्धिपूर्वक कल्याण के मार्ग पर चलता है, वह देहधारी प्राणी इस लोक में भी सुख प्राप्त करता है और परलोक में भी सुख प्राप्त करता है ॥ 36॥
 
He whose body is his home, who regards inner and outer purity as a pilgrimage and who wisely walks on the path of welfare, that embodied being attains happiness in this world as well as the next. ॥ 36॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)