श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 298: पराशरगीताका उपसंहार—राजा जनकके विविध प्रश्नोंका उत्तर  »  श्लोक 34
 
 
श्लोक  12.298.34 
यथा समुद्रमभित: संश्रिता: सरितोऽपरा:।
तथाद्या प्रकृतिर्योगादभिसंश्रियते सदा॥ ३४॥
 
 
अनुवाद
जैसे सब दिशाओं से आने वाली अनेक नदियाँ समुद्र में मिल जाती हैं, वैसे ही योग द्वारा नियंत्रित मन सदा के लिए मूल प्रकृति में लीन हो जाता है ॥ 34॥
 
Just as many rivers coming from all directions merge into the ocean, similarly the mind controlled by Yoga merges into the original nature forever. ॥ 34॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)