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mahabharat 12.298.29: मृत्यु दिन-रात संसार में वृद्धावस्था का रूप धारण करके घूमती हुई समस्त प्राणियों को उसी प्रकार खा जाती है, जैसे साँप वायु को पी जाता है ॥29॥   |   mahabharat अध्याय 12.298: पराशरगीताका उपसंहार—राजा जनकके विविध प्रश्नोंका उत्तर   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 298: पराशरगीताका उपसंहार—राजा जनकके विविध प्रश्नोंका उत्तर  »  श्लोक 29
 
 
श्लोक  12.298.29 
अहोरात्रमये लोके जरारूपेण संसरन्।
मृत्युर्ग्रसति भूतानि पवनं पन्नगो यथा॥ २९॥
 
 
अनुवाद
मृत्यु दिन-रात संसार में वृद्धावस्था का रूप धारण करके घूमती हुई समस्त प्राणियों को उसी प्रकार खा जाती है, जैसे साँप वायु को पी जाता है ॥29॥
 
Death, roaming in the world of day and night in the guise of old age, consumes all creatures just as a snake drinks air. ॥29॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)