श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 298: पराशरगीताका उपसंहार—राजा जनकके विविध प्रश्नोंका उत्तर  »  श्लोक 27
 
 
श्लोक  12.298.27 
नीहारेण हि संवीत: शिश्नोदरपरायण:।
जात्यन्ध इव पन्थानमावृतात्मा न बुद्धॺते॥ २७॥
 
 
अनुवाद
जैसे जन्मांध मनुष्य मार्ग नहीं देख सकता, वैसे ही लिंग पर आश्रित और अज्ञान से आवृत प्राणी मोह रूपी कोहरे से आवृत होने के कारण मोक्ष मार्ग को समझने में असमर्थ होता है ॥27॥
 
Just as a person born blind cannot see the path, in the same way, a creature dependent on the penis and covered with ignorance is unable to understand the path to salvation because it is covered with the fog of illusion. 27॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)