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mahabharat 12.298.22: मन आत्मा को योग की ओर ले जाता है। योगी मन को योग में लीन (आत्मा में लीन) कर देता है। इस प्रकार जब वह योग में सिद्धि प्राप्त कर लेता है, तब उसे परब्रह्म का साक्षात्कार हो जाता है ॥22॥   |   mahabharat अध्याय 12.298: पराशरगीताका उपसंहार—राजा जनकके विविध प्रश्नोंका उत्तर   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 298: पराशरगीताका उपसंहार—राजा जनकके विविध प्रश्नोंका उत्तर  »  श्लोक 22
 
 
श्लोक  12.298.22 
मन: प्रणयतेऽऽत्मानं स एनमभियुञ्जति।
युक्तो यदा स भवति तदा तं पश्यते परम्॥ २२॥
 
 
अनुवाद
मन आत्मा को योग की ओर ले जाता है। योगी मन को योग में लीन (आत्मा में लीन) कर देता है। इस प्रकार जब वह योग में सिद्धि प्राप्त कर लेता है, तब उसे परब्रह्म का साक्षात्कार हो जाता है ॥22॥
 
The mind leads the soul towards yoga. The yogi makes the mind absorbed in yoga (absorbed in the soul). In this way, when he attains perfection in yoga, then he realizes the Supreme Being. ॥22॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)