श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 298: पराशरगीताका उपसंहार—राजा जनकके विविध प्रश्नोंका उत्तर  »  श्लोक 18
 
 
श्लोक  12.298.18 
यथान्ध: स्वगृहे युक्तो ह्यभ्यासादेव गच्छति।
तथा युक्तेन मनसा प्राज्ञो गच्छति तां गतिम्॥ १८॥
 
 
अनुवाद
जैसे अंधा मनुष्य प्रतिदिन अभ्यास के द्वारा सावधानी के साथ बाहर से ही अपने घर में आ जाता है, वैसे ही बुद्धिमान् पुरुष योगयुक्त मन के द्वारा उस परमपद को प्राप्त कर लेता है ॥18॥
 
Just as a blind man comes into his house from outside with caution through daily practice, in the same way a wise man attains that supreme state through a mind with yoga. 18॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)