श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 298: पराशरगीताका उपसंहार—राजा जनकके विविध प्रश्नोंका उत्तर  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  12.298.17 
न धर्मकाल: पुरुषस्य निश्चितो
न चापि मृत्यु: पुरुषं प्रतीक्षते।
सदा हि धर्मस्य क्रियैव शोभना
यदा नरो मृत्युमुखेऽभिवर्तते॥ १७॥
 
 
अनुवाद
मनुष्य के लिए अपने कर्तव्य पालन हेतु कोई निश्चित समय नहीं है, क्योंकि मृत्यु किसी की प्रतीक्षा नहीं करती। जब मनुष्य सदैव मृत्यु के सम्मुख रहता है, तब उसके लिए अपने कर्तव्यों का नियमित पालन करते रहना गौरव की बात है।॥17॥
 
There is no specific time fixed for a man to perform his duties because death does not await anyone. When a man is always in the face of death, it is a matter of pride for him to continue performing his duties regularly.॥ 17॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)