श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 298: पराशरगीताका उपसंहार—राजा जनकके विविध प्रश्नोंका उत्तर  »  श्लोक 15
 
 
श्लोक  12.298.15 
प्रसक्तबुद्धिर्विषयेषु यो नरो
न बुध्यते ह्यात्महितं कथंचन।
स सर्वभावानुगतेन चेतसा
नृपामिषेणेव झषो विकृष्यते॥ १५॥
 
 
अनुवाद
परंतु जिस मनुष्य की बुद्धि सांसारिक पदार्थों में आसक्त रहती है, वह किसी भी प्रकार अपना कल्याण नहीं समझता। राजन! जैसे मछली काँटे में फँसे हुए मांस की ओर आकर्षित होकर दुःख भोगती है, वैसे ही वह भी सब प्रकार की कामनाओं से युक्त मन से सांसारिक पदार्थों की ओर आकर्षित होकर दुःख भोगता है॥15॥
 
But a person whose intellect is attached to worldly things does not understand his own welfare in any way. King! Just as a fish is attracted to the meat stuck in a hook and suffers pain, in the same way he is attracted to the worldly things with his mind filled with all kinds of desires and suffers pain. ॥ 15॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)