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mahabharat 12.298.14: जब मनुष्य परमपद पाने के लिए आतुर हो जाता है, तब उसकी बुद्धि सांसारिक सुखों से विरक्त हो जाती है और वह स्त्री, धन, पद, वाहन और नाना प्रकार के कर्मों का भी त्याग कर देता है ॥14॥   |   mahabharat अध्याय 12.298: पराशरगीताका उपसंहार—राजा जनकके विविध प्रश्नोंका उत्तर   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 298: पराशरगीताका उपसंहार—राजा जनकके विविध प्रश्नोंका उत्तर  »  श्लोक 14
 
 
श्लोक  12.298.14 
जहाति दारांश्च जहाति सम्पद:
पदं च यानं विविधाश्च या: क्रिया:।
त्रिविष्टपे जातमतिर्यदा नर-
स्तदास्य बुद्धिर्विषयेषु भिद्यते॥ १४॥
 
 
अनुवाद
जब मनुष्य परमपद पाने के लिए आतुर हो जाता है, तब उसकी बुद्धि सांसारिक सुखों से विरक्त हो जाती है और वह स्त्री, धन, पद, वाहन और नाना प्रकार के कर्मों का भी त्याग कर देता है ॥14॥
 
When a man becomes anxious to attain the highest position, his intellect becomes detached from worldly pleasures and he even abandons women, wealth, position, vehicles and various kinds of activities. ॥14॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)