श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 297: पराशरगीता—नाना प्रकारके धर्म और कर्तव्योंका उपदेश  »  श्लोक 15
 
 
श्लोक  12.297.15 
त्वगन्तं देहमित्याहुर्विद्वांसोऽध्यात्मचिन्तका:।
गुणैरपि परिक्षीणं शरीरं मर्त्यतां गतम्॥ १५॥
 
 
अनुवाद
अध्यात्म तत्त्व का चिंतन करने वाले बुद्धिमान पुरुष कहते हैं कि इस शरीर के अन्त में अर्थात् बाह्य भाग में केवल त्वचा है। वह भी सौन्दर्य आदि गुणों से रहित है। इसकी मृत्यु अवश्यम्भावी है। 15॥
 
Wise men who contemplate on the spiritual principle say that at the end of this body i.e. in the outer part there is only skin. It is also devoid of qualities like beauty etc. Its death is inevitable. 15॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)