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mahabharat 12.296.37-38: जो मनुष्य अग्निहोत्र का अनुष्ठान त्यागकर, उदासीन मन से सब कुछ देखकर, सब प्रकार की चिंताओं से मुक्त होकर, धीरे-धीरे शुभ कर्मों के मार्ग पर चलते हैं, नम्रता, शील, संयम आदि गुणों को अपनाते हैं और कठोर व्रतों का पालन करते हैं, वे सब कर्मों से मुक्त होकर अविनाशी पद को प्राप्त होते हैं।   |   mahabharat अध्याय 12.296: पराशरगीता—वर्णविशेषकी उत्पत्तिका रहस्य, तपोबलसे उत्कृष्ट वर्णकी प्राप्ति, विभिन्न वर्णोंके विशेष और सामान्य धर्म, सत्कर्मकी श्रेष्ठता तथा हिंसारहित धर्मका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 296: पराशरगीता—वर्णविशेषकी उत्पत्तिका रहस्य, तपोबलसे उत्कृष्ट वर्णकी प्राप्ति, विभिन्न वर्णोंके विशेष और सामान्य धर्म, सत्कर्मकी श्रेष्ठता तथा हिंसारहित धर्मका वर्णन  »  श्लोक 37-38
 
 
श्लोक  12.296.37-38 
संन्यस्याग्नीनुदासीना: पश्यन्ति विगतज्वरा:।
नै:श्रेयसं कर्मपथं समारुह्य यथाक्रमम्॥ ३७॥
प्रश्रिता विनयोपेता दमनित्या: सुसंशिता:।
प्रयान्ति स्थानमजरं सर्वकर्मविवर्जिता:॥ ३८॥
 
 
अनुवाद
जो मनुष्य अग्निहोत्र का अनुष्ठान त्यागकर, उदासीन मन से सब कुछ देखकर, सब प्रकार की चिंताओं से मुक्त होकर, धीरे-धीरे शुभ कर्मों के मार्ग पर चलते हैं, नम्रता, शील, संयम आदि गुणों को अपनाते हैं और कठोर व्रतों का पालन करते हैं, वे सब कर्मों से मुक्त होकर अविनाशी पद को प्राप्त होते हैं।
 
Those who, having given up the ritual of Agnihotra and having observed everything with an indifferent mind, being free from all kinds of worries, gradually embark on the path of auspicious deeds, adopt the virtues like humility, modesty, self-control and observe strict vows, they, being free from all deeds, attain the imperishable position.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)