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mahabharat 12.296.35: जनक ने पूछा, 'हे ब्राह्मणश्रेष्ठ! इस संसार में ऐसे कौन से धर्मकर्म हैं जिनसे किसी भी प्राणी को कोई हानि नहीं होती?'   |   mahabharat अध्याय 12.296: पराशरगीता—वर्णविशेषकी उत्पत्तिका रहस्य, तपोबलसे उत्कृष्ट वर्णकी प्राप्ति, विभिन्न वर्णोंके विशेष और सामान्य धर्म, सत्कर्मकी श्रेष्ठता तथा हिंसारहित धर्मका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 296: पराशरगीता—वर्णविशेषकी उत्पत्तिका रहस्य, तपोबलसे उत्कृष्ट वर्णकी प्राप्ति, विभिन्न वर्णोंके विशेष और सामान्य धर्म, सत्कर्मकी श्रेष्ठता तथा हिंसारहित धर्मका वर्णन  »  श्लोक 35
 
 
श्लोक  12.296.35 
जनक उवाच
कानि कर्माणि धर्म्याणि लोकेऽस्मिन् द्विजसत्तम।
न हिंसन्तीह भूतानि क्रियमाणानि सर्वदा॥ ३५॥
 
 
अनुवाद
जनक ने पूछा, 'हे ब्राह्मणश्रेष्ठ! इस संसार में ऐसे कौन से धर्मकर्म हैं जिनसे किसी भी प्राणी को कोई हानि नहीं होती?'
 
Janaka asked, 'O best of Brahmins! What are those religious deeds in this world which do not result in any harm to any living creature?'
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)