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mahabharat 12.296.27: यह तो निश्चित है कि शूद्र पतित नहीं है और वह उपनयन आदि संस्कारों का अधिकारी नहीं है। वह अग्निहोत्र आदि वैदिक अनुष्ठानों का भी अधिकारी नहीं है; परन्तु उपर्युक्त सामान्य धार्मिक कर्म उसके लिए निषिद्ध नहीं हैं॥ 27॥   |   mahabharat अध्याय 12.296: पराशरगीता—वर्णविशेषकी उत्पत्तिका रहस्य, तपोबलसे उत्कृष्ट वर्णकी प्राप्ति, विभिन्न वर्णोंके विशेष और सामान्य धर्म, सत्कर्मकी श्रेष्ठता तथा हिंसारहित धर्मका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 296: पराशरगीता—वर्णविशेषकी उत्पत्तिका रहस्य, तपोबलसे उत्कृष्ट वर्णकी प्राप्ति, विभिन्न वर्णोंके विशेष और सामान्य धर्म, सत्कर्मकी श्रेष्ठता तथा हिंसारहित धर्मका वर्णन  »  श्लोक 27
 
 
श्लोक  12.296.27 
न चापि शूद्र: पततीति निश्चयो
न चापि संस्कारमिहार्हतीति वा।
श्रुतिप्रवृत्तं न च धर्ममाप्नुते
न चास्य धर्मे प्रतिषेधनं कृतम्॥ २७॥
 
 
अनुवाद
यह तो निश्चित है कि शूद्र पतित नहीं है और वह उपनयन आदि संस्कारों का अधिकारी नहीं है। वह अग्निहोत्र आदि वैदिक अनुष्ठानों का भी अधिकारी नहीं है; परन्तु उपर्युक्त सामान्य धार्मिक कर्म उसके लिए निषिद्ध नहीं हैं॥ 27॥
 
It is certain that a Shudra is not a fallen person and he is not entitled to the rituals like Upanayana etc. He is also not entitled to perform Vedic rituals like Agnihotra etc.; but the above mentioned general religious practices are not prohibited for him.॥ 27॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)