Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 12.296.26: नरेश्वर! ये तीनों वर्ण विपरीत कर्मों में प्रवृत्त होने पर पतित हो जाते हैं। जैसे ये सत्पुरुषों का आश्रय लेकर अपने-अपने कर्मों में लगे रहकर उन्नति करते हैं, वैसे ही विपरीत कर्म करने से इनका पतन भी होता है॥26॥ | mahabharat अध्याय 12.296: पराशरगीता—वर्णविशेषकी उत्पत्तिका रहस्य, तपोबलसे उत्कृष्ट वर्णकी प्राप्ति, विभिन्न वर्णोंके विशेष और सामान्य धर्म, सत्कर्मकी श्रेष्ठता तथा हिंसारहित धर्मका वर्णन । mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
नरेश्वर! ये तीनों वर्ण विपरीत कर्मों में प्रवृत्त होने पर पतित हो जाते हैं। जैसे ये सत्पुरुषों का आश्रय लेकर अपने-अपने कर्मों में लगे रहकर उन्नति करते हैं, वैसे ही विपरीत कर्म करने से इनका पतन भी होता है॥26॥
Nareshwar! These three varnas become degenerate when they indulge in opposite actions. Just as they progress by taking the shelter of good men and being engaged in their respective deeds, in the same way they also fall by performing opposite deeds. 26॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥