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mahabharat 12.296.14-16: विदेहराज! मेरे पितामह वशिष्ठजी, काश्यपगोत्रीय ऋष्यश्रृंग, वेद, तण्ड, कृपाचार्य, काशीवान, कमठ आदि, यवक्रीत, वक्ताओं में श्रेष्ठ द्रोण, आयु, मतंग, दत्त, द्रुपद और मत्स्य - ये सभी तपस्या का आश्रय लेकर ही अपने-अपने स्वरूप को प्राप्त हुए थे। इन्द्रिय संयम और तपस्या के द्वारा ही वे वेदों के विद्वान् बने और समाज में प्रतिष्ठित हुए।   |   mahabharat अध्याय 12.296: पराशरगीता—वर्णविशेषकी उत्पत्तिका रहस्य, तपोबलसे उत्कृष्ट वर्णकी प्राप्ति, विभिन्न वर्णोंके विशेष और सामान्य धर्म, सत्कर्मकी श्रेष्ठता तथा हिंसारहित धर्मका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 296: पराशरगीता—वर्णविशेषकी उत्पत्तिका रहस्य, तपोबलसे उत्कृष्ट वर्णकी प्राप्ति, विभिन्न वर्णोंके विशेष और सामान्य धर्म, सत्कर्मकी श्रेष्ठता तथा हिंसारहित धर्मका वर्णन  »  श्लोक 14-16
 
 
श्लोक  12.296.14-16 
पितामहश्च मे पूर्वमृष्यशृङ्गश्च काश्यप:।
वेदस्ताण्डॺ: कृपश्चैव कक्षीवान् कमठादय:॥ १४॥
यवक्रीतश्च नृपते द्रोणश्च वदतां वर:।
आयुर्मतङ्गो दत्तश्च द्रुपदो मत्स्य एव च॥ १५॥
एते स्वां प्रकृतिं प्राप्ता वैदेह तपसोऽऽश्रयात् ।
प्रतिष्ठिता वेदविदो दमेन तपसैव हि॥ १६॥
 
 
अनुवाद
विदेहराज! मेरे पितामह वशिष्ठजी, काश्यपगोत्रीय ऋष्यश्रृंग, वेद, तण्ड, कृपाचार्य, काशीवान, कमठ आदि, यवक्रीत, वक्ताओं में श्रेष्ठ द्रोण, आयु, मतंग, दत्त, द्रुपद और मत्स्य - ये सभी तपस्या का आश्रय लेकर ही अपने-अपने स्वरूप को प्राप्त हुए थे। इन्द्रिय संयम और तपस्या के द्वारा ही वे वेदों के विद्वान् बने और समाज में प्रतिष्ठित हुए।
 
Videraj! My grandfather Vashishthaji, Kashyap-Gotriya Rishyasringa, Veda, Tanda, Kripa, Kashivan, Kamath etc., Yavakrit, Drona, the best among speakers, Ayu, Matanga, Datta, Drupada and Matsya – all of them attained their respective natures only by taking shelter of penance. It was through restraint of senses and penance that he became a scholar of the Vedas and became respected in the society.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)