श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 295: पराशरगीता—विषयासक्त मनुष्यका पतन, तपोबलकी श्रेष्ठता तथा दृढ़तापूर्वक स्वधर्मपालनका आदेश  »  श्लोक 8
 
 
श्लोक  12.295.8 
स जानन्नपि चाकार्यमर्थार्थं सेवते नर:।
बालस्नेहपरीतात्मा तत्क्षयाच्चानुतप्यते॥ ८॥
 
 
अनुवाद
यद्यपि मनुष्य जानता है कि अमुक कार्य करना पाप है, फिर भी वह धन के लिए उसमें लिप्त रहता है। उसका मन अपने बच्चों के प्रेम में डूबा रहता है और जब उनमें से कोई मर जाता है, तो वह उनके लिए बार-बार दुःखी होता है ॥8॥
 
Although a man knows that doing a certain thing is a sin, he still indulges in it for money. His mind is immersed in the love for his children and when one of them dies, he is repeatedly distressed for them. ॥ 8॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)