श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 295: पराशरगीता—विषयासक्त मनुष्यका पतन, तपोबलकी श्रेष्ठता तथा दृढ़तापूर्वक स्वधर्मपालनका आदेश  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक  12.295.5 
रागद्वेषाभिभूतं च नरं द्रव्यवशानुगम्।
मोहजाता रतिर्नाम समुपैति नराधिप॥ ५॥
 
 
अनुवाद
हे मनुष्यों के स्वामी! जब मनुष्य राग-द्वेष के वश होकर पदार्थों में आसक्त हो जाता है, तब आसक्ति की पुत्री रति उसके पास आती है॥5॥
 
O Lord of men! When a man becomes attached to material things under the influence of passion and hatred, then Rati, the daughter of attachment, comes to him. ॥ 5॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)