श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 295: पराशरगीता—विषयासक्त मनुष्यका पतन, तपोबलकी श्रेष्ठता तथा दृढ़तापूर्वक स्वधर्मपालनका आदेश  »  श्लोक 35
 
 
श्लोक  12.295.35 
अप्रयत्नागता: सेव्या गृहस्थैर्विषया: सदा।
प्रयत्नेनोपगम्यश्च स्वधर्म इति मे मति:॥ ३५॥
 
 
अनुवाद
अतः गृहस्थ को चाहिए कि वह अपने पास आने वाली वस्तुओं का सदैव अनायास ही भोग करे और यदि प्रयत्न करे तो धर्म का पालन करे, ऐसा मेरा मत है ॥35॥
 
Therefore, a householder should always enjoy the objects that come to him by himself without any effort and if he makes an effort, he should follow his Dharma. This is my opinion. ॥ 35॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)