श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 295: पराशरगीता—विषयासक्त मनुष्यका पतन, तपोबलकी श्रेष्ठता तथा दृढ़तापूर्वक स्वधर्मपालनका आदेश  »  श्लोक 32
 
 
श्लोक  12.295.32 
इषुप्रपातमात्रं हि स्पर्शयोगे रति: स्मृता।
रसने दर्शने घ्राणे श्रवणे च विशाम्पते॥ ३२॥
 
 
अनुवाद
प्रजानाथ! धनुष से छूटकर बाण को पृथ्वी पर गिरने में जितना समय लगता है, उतना ही समय स्पर्श, रस, नेत्र, नाक और कान के विषयों का सुख भोगने में लगता है, अर्थात् विषयों का सुख क्षणिक है।
 
Prajanath! The time it takes for the arrow to leave the bow and fall on the earth is the same amount of time it takes to experience the pleasure of the objects of touch, taste, eyes, nose and ears, that is, the pleasure of the objects is momentary.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)