श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 295: पराशरगीता—विषयासक्त मनुष्यका पतन, तपोबलकी श्रेष्ठता तथा दृढ़तापूर्वक स्वधर्मपालनका आदेश  »  श्लोक 3
 
 
श्लोक  12.295.3 
गृहाण्याश्रित्य गावश्च क्षेत्राणि च धनानि च।
दारा: पुत्राश्च भृत्याश्च भवन्तीह नरस्य वै॥ ३॥
 
 
अनुवाद
जैसे ही कोई व्यक्ति घर में आश्रय लेता है, वह अपनी गायों, खेती, धन, स्त्री, पुत्र और अन्य अपने भरण-पोषण में समर्थ सम्बन्धियों के साथ सम्बन्ध स्थापित कर लेता है ॥3॥
 
As soon as a person takes shelter at home, he establishes a relationship with his cows, farming, wealth, wife, son and other relatives capable of supporting him. 3॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)