श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 295: पराशरगीता—विषयासक्त मनुष्यका पतन, तपोबलकी श्रेष्ठता तथा दृढ़तापूर्वक स्वधर्मपालनका आदेश  »  श्लोक 25
 
 
श्लोक  12.295.25 
असंतोषोऽसुखायेति लोभादिन्द्रियसम्भ्रम:।
ततोऽस्य नश्यति प्रज्ञा विद्येवाभ्यासवर्जिता॥ २५॥
 
 
अनुवाद
असंतोष दुख का कारण है। लोभ मन और इंद्रियों को अशांत बनाता है, जो मनुष्य की बुद्धि को उसी प्रकार नष्ट कर देता है, जैसे अभ्यास के बिना ज्ञान नष्ट हो जाता है।
 
Discontentment is the cause of misery. Greed makes the mind and senses restless, which destroys man's intelligence just like knowledge without practice.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)