श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 295: पराशरगीता—विषयासक्त मनुष्यका पतन, तपोबलकी श्रेष्ठता तथा दृढ़तापूर्वक स्वधर्मपालनका आदेश  »  श्लोक 2
 
 
श्लोक  12.295.2 
प्रायेण च गृहस्थस्य ममत्वं नाम जायते।
सङ्गागतं नरश्रेष्ठ भावै राजसतामसै:॥ २॥
 
 
अनुवाद
नरश्रेष्ठ! गृहस्थ में प्रायः राजस और तामस भावों के संयोग से वस्तुओं और व्यक्तियों के प्रति आसक्ति उत्पन्न हो जाती है। 2॥
 
Narashrestha! A householder often develops attachment to things and people due to the combination of Rajas and Tamas emotions. 2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)