श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 295: पराशरगीता—विषयासक्त मनुष्यका पतन, तपोबलकी श्रेष्ठता तथा दृढ़तापूर्वक स्वधर्मपालनका आदेश  »  श्लोक 13
 
 
श्लोक  12.295.13 
दुर्लभो हि मनुष्येन्द्र नर: प्रत्यवमर्शवान्।
यो वै प्रियसुखे क्षीणे तप: कर्तुं व्यवस्यति॥ १३॥
 
 
अनुवाद
नरेन्द्र! संसार में ऐसा बुद्धिमान पुरुष दुर्लभ है, जो पत्नी, पुत्र आदि प्रियजनों के सुख के अभाव में तप करने का निश्चय करता है॥13॥
 
Narendra! Such a wise man is rare in the world, who decides to indulge in penance in the absence of happiness from loved ones like wife, son etc. 13॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)