Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 12.294.30: धार्मिक, विद्वान् पुरुष को, चाहे वह चेतन हो या अचेतन, संसार में सबके प्रति आत्मसम्मान रखते हुए तथा किसी भी प्राणी की हिंसा न करते हुए, सदैव समतापूर्वक व्यवहार करना चाहिए ॥30॥ | mahabharat अध्याय 12.294: पराशरगीता—ब्राह्मण और शूद्रकी जीविका, निन्दनीय कर्मोंके त्यागकी आज्ञा, मनुष्योंमें आसुरभावकी उत्पत्ति और भगवान् शिवके द्वारा उसका निवारण तथा स्वधर्मके अनुसार कर्तव्यपालनका आदेश । mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
धर्मशीलो नरो विद्वानीहकोऽनीहकोऽपि वा।
आत्मभूत: सदा लोके चरेद् भूतान्यहिंसया॥ ३०॥
अनुवाद
धार्मिक, विद्वान् पुरुष को, चाहे वह चेतन हो या अचेतन, संसार में सबके प्रति आत्मसम्मान रखते हुए तथा किसी भी प्राणी की हिंसा न करते हुए, सदैव समतापूर्वक व्यवहार करना चाहिए ॥30॥
A religious, learned man, whether conscious or unconscious, should always behave with equanimity by having self-respect towards everyone in the world and not doing violence to any living being. 30॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥