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mahabharat 12.294.29: महाराज! यहाँ धर्म और अधर्म मनुष्यों में उसी प्रकार निवास करते हैं, जैसे मनुष्य के अतिरिक्त अन्य प्राणियों में नहीं करते ॥29॥   |   mahabharat अध्याय 12.294: पराशरगीता—ब्राह्मण और शूद्रकी जीविका, निन्दनीय कर्मोंके त्यागकी आज्ञा, मनुष्योंमें आसुरभावकी उत्पत्ति और भगवान् शिवके द्वारा उसका निवारण तथा स्वधर्मके अनुसार कर्तव्यपालनका आदेश   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 294: पराशरगीता—ब्राह्मण और शूद्रकी जीविका, निन्दनीय कर्मोंके त्यागकी आज्ञा, मनुष्योंमें आसुरभावकी उत्पत्ति और भगवान् शिवके द्वारा उसका निवारण तथा स्वधर्मके अनुसार कर्तव्यपालनका आदेश  »  श्लोक 29
 
 
श्लोक  12.294.29 
मानुषेषु महाराज धर्माधर्मौ प्रवर्तत:।
न तथान्येषु भूतेषु मनुष्यरहितेष्विह॥ २९॥
 
 
अनुवाद
महाराज! यहाँ धर्म और अधर्म मनुष्यों में उसी प्रकार निवास करते हैं, जैसे मनुष्य के अतिरिक्त अन्य प्राणियों में नहीं करते ॥29॥
 
Maharaj! Here, Dharma and Adharma reside in humans in the same way as they do not reside in other creatures other than humans. ॥ 29॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)