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mahabharat 12.294.27: जीव के हजारों जन्म अच्छे-बुरे, शत्रुता-मित्रता का संयोग भोगते हुए बीत जाते हैं ॥27॥   |   mahabharat अध्याय 12.294: पराशरगीता—ब्राह्मण और शूद्रकी जीविका, निन्दनीय कर्मोंके त्यागकी आज्ञा, मनुष्योंमें आसुरभावकी उत्पत्ति और भगवान् शिवके द्वारा उसका निवारण तथा स्वधर्मके अनुसार कर्तव्यपालनका आदेश   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 294: पराशरगीता—ब्राह्मण और शूद्रकी जीविका, निन्दनीय कर्मोंके त्यागकी आज्ञा, मनुष्योंमें आसुरभावकी उत्पत्ति और भगवान् शिवके द्वारा उसका निवारण तथा स्वधर्मके अनुसार कर्तव्यपालनका आदेश  »  श्लोक 27
 
 
श्लोक  12.294.27 
इष्टानिष्टसमायोगो वैरं सौहार्दमेव च।
अथ जातिसहस्राणि बहूनि परिवर्तते॥ २७॥
 
 
अनुवाद
जीव के हजारों जन्म अच्छे-बुरे, शत्रुता-मित्रता का संयोग भोगते हुए बीत जाते हैं ॥27॥
 
Thousands of births of a living being pass by experiencing the conjunction of good and bad, enmity and friendship. ॥27॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)