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mahabharat 12.294.25: बुद्धिमान् पुरुष को चाहिए कि धर्म के लिए न्याय का परित्याग करके पाप से धन संचय न करे; क्योंकि वह हितकर नहीं कहा गया है ॥25॥   |   mahabharat अध्याय 12.294: पराशरगीता—ब्राह्मण और शूद्रकी जीविका, निन्दनीय कर्मोंके त्यागकी आज्ञा, मनुष्योंमें आसुरभावकी उत्पत्ति और भगवान् शिवके द्वारा उसका निवारण तथा स्वधर्मके अनुसार कर्तव्यपालनका आदेश   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 294: पराशरगीता—ब्राह्मण और शूद्रकी जीविका, निन्दनीय कर्मोंके त्यागकी आज्ञा, मनुष्योंमें आसुरभावकी उत्पत्ति और भगवान् शिवके द्वारा उसका निवारण तथा स्वधर्मके अनुसार कर्तव्यपालनका आदेश  »  श्लोक 25
 
 
श्लोक  12.294.25 
न संकरेण द्रविणं प्रचिन्वीयाद् विचक्षण:।
धर्मार्थं न्यायमुत्सृज्य न तत् कल्याणमुच्यते॥ २५॥
 
 
अनुवाद
बुद्धिमान् पुरुष को चाहिए कि धर्म के लिए न्याय का परित्याग करके पाप से धन संचय न करे; क्योंकि वह हितकर नहीं कहा गया है ॥25॥
 
A wise man should not abandon justice for the sake of doing righteousness and accumulate wealth through sinful means; Because it is not said to be beneficial. 25॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)