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mahabharat 12.294.24: इसलिए हे राजन! बहुत विचार और विचार के बाद मैं शास्त्रानुसार कहता हूँ कि मनुष्य को उन्नति करने का प्रयत्न अवश्य करना चाहिए, परन्तु हिंसात्मक कार्यों का त्याग कर देना चाहिए। ॥24॥   |   mahabharat अध्याय 12.294: पराशरगीता—ब्राह्मण और शूद्रकी जीविका, निन्दनीय कर्मोंके त्यागकी आज्ञा, मनुष्योंमें आसुरभावकी उत्पत्ति और भगवान् शिवके द्वारा उसका निवारण तथा स्वधर्मके अनुसार कर्तव्यपालनका आदेश   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 294: पराशरगीता—ब्राह्मण और शूद्रकी जीविका, निन्दनीय कर्मोंके त्यागकी आज्ञा, मनुष्योंमें आसुरभावकी उत्पत्ति और भगवान् शिवके द्वारा उसका निवारण तथा स्वधर्मके अनुसार कर्तव्यपालनका आदेश  »  श्लोक 24
 
 
श्लोक  12.294.24 
तस्मादहं ब्रवीमि त्वां राजन् संचिन्त्य शास्त्रत:।
संसिद्धाधिगमं कुर्यात् कर्म हिंसात्मकं त्यजेत्॥ २४॥
 
 
अनुवाद
इसलिए हे राजन! बहुत विचार और विचार के बाद मैं शास्त्रानुसार कहता हूँ कि मनुष्य को उन्नति करने का प्रयत्न अवश्य करना चाहिए, परन्तु हिंसात्मक कार्यों का त्याग कर देना चाहिए। ॥24॥
 
Therefore, O King, after much deliberation and consideration I say according to the scriptures that a man must try to progress, but he must give up violent acts. ॥24॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)