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mahabharat 12.294.23: वे अत्यंत मूर्ख मनुष्य आज भी उन्हीं राक्षसी प्रवृत्तियों में डूबे हुए हैं, उन्हें स्थापित करते हैं और सब प्रकार से अपनाते हैं ॥23॥   |   mahabharat अध्याय 12.294: पराशरगीता—ब्राह्मण और शूद्रकी जीविका, निन्दनीय कर्मोंके त्यागकी आज्ञा, मनुष्योंमें आसुरभावकी उत्पत्ति और भगवान् शिवके द्वारा उसका निवारण तथा स्वधर्मके अनुसार कर्तव्यपालनका आदेश   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 294: पराशरगीता—ब्राह्मण और शूद्रकी जीविका, निन्दनीय कर्मोंके त्यागकी आज्ञा, मनुष्योंमें आसुरभावकी उत्पत्ति और भगवान् शिवके द्वारा उसका निवारण तथा स्वधर्मके अनुसार कर्तव्यपालनका आदेश  »  श्लोक 23
 
 
श्लोक  12.294.23 
प्रत्यतिष्ठंश्च तेष्वेव तान्येव स्थापयन्त्यपि।
भजन्ते तानि चाद्यापि ये बालिशतरा नरा:॥ २३॥
 
 
अनुवाद
वे अत्यंत मूर्ख मनुष्य आज भी उन्हीं राक्षसी प्रवृत्तियों में डूबे हुए हैं, उन्हें स्थापित करते हैं और सब प्रकार से अपनाते हैं ॥23॥
 
Those men who are extremely foolish are even today immersed in the same demonic tendencies; they establish them and adopt them in every way. ॥23॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)