श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 293: पराशरगीता—शूद्रके लिये सेवावृत्तिकी प्रधानता, सत्संगकी महिमा और चारों वर्णोंके धर्मपालनका महत्त्व  »  श्लोक 6
 
 
श्लोक  12.293.6 
तस्माद् गुणेषु रज्येथा मा दोषेषु कदाचन।
अनित्यमिह मर्त्यानां जीवितं हि चलाचलम्॥ ६॥
 
 
अनुवाद
इसलिए तुम्हें गुणों में ही प्रीति रखनी चाहिए, दोषों में कभी नहीं, क्योंकि यहाँ मनुष्यों का जीवन क्षणभंगुर और चंचल है ॥6॥
 
Therefore you should have love for virtues only and never for faults, because the life of humans here is temporary and fickle. ॥ 6॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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