श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 293: पराशरगीता—शूद्रके लिये सेवावृत्तिकी प्रधानता, सत्संगकी महिमा और चारों वर्णोंके धर्मपालनका महत्त्व  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक  12.293.5 
यादृशेन हि वर्णेन भाव्यते शुक्लमम्बरम्।
तादृशं कुरुते रूपमेतदेवमवेहि मे॥ ५॥
 
 
अनुवाद
श्वेत वस्त्र जिस रंग में रंगा जाता है, उसी रंग का हो जाता है। इसी प्रकार मनुष्य जैसी संगति करता है, वैसा ही रंग धारण कर लेता है। यह बात तुम मुझसे अच्छी तरह समझ लो ॥5॥
 
A white cloth takes on the form of the colour in which it is dyed. Similarly, a person acquires the colour of the company he keeps. Understand this from me very well. ॥5॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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