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श्लोक 12.293.21  |
दमेन शोभते विप्र: क्षत्रियो विजयेन तु।
धनेन वैश्य: शूद्रस्तु नित्यं दाक्ष्येण शोभते॥ २१॥ |
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| अनुवाद |
| ब्राह्मण इन्द्रियों को वश में करके, क्षत्रिय युद्ध में विजय प्राप्त करके, वैश्य न्यायपूर्वक अर्जित धन से तथा शूद्र सदैव सेवा में कुशलता प्रदर्शित करके यश प्राप्त करता है। |
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| A Brahmin attains glory by controlling the senses, a Kshatriya by victory in battle, a Vaishya by wealth acquired justly and a Shudra by always displaying skill in service. |
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इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि पराशरगीतायां त्रिनवत्यधिकद्विशततमोऽध्याय:॥ २९३॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें पराशरगीताविषयक दो सौ तिरानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ २९३॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठका १ श्लोक मिलाकर कुल २२ श्लोक हैं) |
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