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mahabharat 12.292.6: जो मनुष्य मौसम का विचार करके प्यासे और भूखे अतिथियों को शुद्ध मन से यथाशक्ति ठंडा या गर्म जल और भोजन देता है, उसे उत्तम फल की प्राप्ति होती है ॥6॥   |   mahabharat अध्याय 12.292: पराशरगीता—धर्मोपार्जित धनकी श्रेष्ठता, अतिथि-सत्कारका महत्त्व, पाँच प्रकारके ऋणोंसे छूटनेकी विधि, भगवत्स्तवनकी महिमा एवं सदाचार तथा गुरुजनोंकी सेवासे महान् लाभ   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 292: पराशरगीता—धर्मोपार्जित धनकी श्रेष्ठता, अतिथि-सत्कारका महत्त्व, पाँच प्रकारके ऋणोंसे छूटनेकी विधि, भगवत्स्तवनकी महिमा एवं सदाचार तथा गुरुजनोंकी सेवासे महान् लाभ  »  श्लोक 6
 
 
श्लोक  12.292.6 
अपो हि प्रयत: शीतास्तापिता ज्वलनेन वा।
शक्तितोऽतिथये दत्त्वा क्षुधार्तायाश्नुते फलम्॥ ६॥
 
 
अनुवाद
जो मनुष्य मौसम का विचार करके प्यासे और भूखे अतिथियों को शुद्ध मन से यथाशक्ति ठंडा या गर्म जल और भोजन देता है, उसे उत्तम फल की प्राप्ति होती है ॥6॥
 
He who, considering the weather, offers cold or hot water and food to thirsty and hungry guests according to his capacity with a pure heart, receives excellent results. ॥ 6॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)