Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 12.292.5: जो मनुष्य धर्म का पालन करना चाहता है, उसे क्रूर कर्मों से धन नहीं कमाना चाहिए। उसे अपनी क्षमता के अनुसार सभी अच्छे कर्म करने चाहिए। उसे अपने धन को बढ़ाने की चिंता नहीं करनी चाहिए। | mahabharat अध्याय 12.292: पराशरगीता—धर्मोपार्जित धनकी श्रेष्ठता, अतिथि-सत्कारका महत्त्व, पाँच प्रकारके ऋणोंसे छूटनेकी विधि, भगवत्स्तवनकी महिमा एवं सदाचार तथा गुरुजनोंकी सेवासे महान् लाभ । mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
न धर्मार्थी नृशंसेन कर्मणा धनमर्जयेत्।
शक्तित: सर्वकार्याणि कुर्यान्नर्द्धिमनुस्मरेत्॥ ५॥
अनुवाद
जो मनुष्य धर्म का पालन करना चाहता है, उसे क्रूर कर्मों से धन नहीं कमाना चाहिए। उसे अपनी क्षमता के अनुसार सभी अच्छे कर्म करने चाहिए। उसे अपने धन को बढ़ाने की चिंता नहीं करनी चाहिए।
A man who wants to follow Dharma should not earn money by cruel acts. He should do all good deeds according to his capacity. He should not worry about increasing his wealth.
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥