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mahabharat 12.292.22: पुरुषसिंह! अग्नि, आत्मा, माता, जन्मदाता पिता और गुरु - इन सबकी यथाशक्ति सेवा करनी चाहिए।   |   mahabharat अध्याय 12.292: पराशरगीता—धर्मोपार्जित धनकी श्रेष्ठता, अतिथि-सत्कारका महत्त्व, पाँच प्रकारके ऋणोंसे छूटनेकी विधि, भगवत्स्तवनकी महिमा एवं सदाचार तथा गुरुजनोंकी सेवासे महान् लाभ   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 292: पराशरगीता—धर्मोपार्जित धनकी श्रेष्ठता, अतिथि-सत्कारका महत्त्व, पाँच प्रकारके ऋणोंसे छूटनेकी विधि, भगवत्स्तवनकी महिमा एवं सदाचार तथा गुरुजनोंकी सेवासे महान् लाभ  »  श्लोक 22
 
 
श्लोक  12.292.22 
अग्निरात्मा च माता च पिता जनयिता तथा।
गुरुश्च नरशार्दूल परिचर्या यथातथम्॥ २२॥
 
 
अनुवाद
पुरुषसिंह! अग्नि, आत्मा, माता, जन्मदाता पिता और गुरु - इन सबकी यथाशक्ति सेवा करनी चाहिए।
 
Purusha Singh! Fire, soul, mother, birth father and Guru – all these should be served as per their capacity.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)