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mahabharat 12.292.1: पराशर कहते हैं, "हे राजन! कौन किसकी सहायता करता है और कौन किसको देता है? यह जीव अपने लिए ही सब काम करता है ॥1॥   |   mahabharat अध्याय 12.292: पराशरगीता—धर्मोपार्जित धनकी श्रेष्ठता, अतिथि-सत्कारका महत्त्व, पाँच प्रकारके ऋणोंसे छूटनेकी विधि, भगवत्स्तवनकी महिमा एवं सदाचार तथा गुरुजनोंकी सेवासे महान् लाभ   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 292: पराशरगीता—धर्मोपार्जित धनकी श्रेष्ठता, अतिथि-सत्कारका महत्त्व, पाँच प्रकारके ऋणोंसे छूटनेकी विधि, भगवत्स्तवनकी महिमा एवं सदाचार तथा गुरुजनोंकी सेवासे महान् लाभ  »  श्लोक 1
 
 
श्लोक  12.292.1 
पराशर उवाच
क: कस्य चोपकुरुते कश्च कस्मै प्रयच्छति।
प्राणी करोत्ययं कर्म सर्वमात्मार्थमात्मना॥ १॥
 
 
अनुवाद
पराशर कहते हैं, "हे राजन! कौन किसकी सहायता करता है और कौन किसको देता है? यह जीव अपने लिए ही सब काम करता है ॥1॥
 
Parashara says, "O King! Who helps whom and who gives to whom? This living being does all the work for himself. ॥ 1॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)