Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7
mahabharat 12.291.7: पाप से संबंधित कोई भी कार्य, चाहे उसका परिणाम कितना ही बड़ा क्यों न हो, सांसारिक सुखों से युक्त हो, बुद्धिमान पुरुष को कभी भी उसमें लिप्त नहीं होना चाहिए। उसे उससे उसी प्रकार दूर रहना चाहिए, जैसे पुण्यात्मा पुरुष चांडाल से दूर रहता है। 7.   |   mahabharat अध्याय 12.291: पराशरगीता—कर्मफलकी अनिवार्यता तथा पुण्यकर्मसे लाभ   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 291: पराशरगीता—कर्मफलकी अनिवार्यता तथा पुण्यकर्मसे लाभ  »  श्लोक 7
 
 
श्लोक  12.291.7 
पापानुबन्धं यत् कर्म यद्यपि स्यान्महाफलम्।
तन्न सेवेत मेधावी शुचि: कुशलिनं यथा॥ ७॥
 
 
अनुवाद
पाप से संबंधित कोई भी कार्य, चाहे उसका परिणाम कितना ही बड़ा क्यों न हो, सांसारिक सुखों से युक्त हो, बुद्धिमान पुरुष को कभी भी उसमें लिप्त नहीं होना चाहिए। उसे उससे उसी प्रकार दूर रहना चाहिए, जैसे पुण्यात्मा पुरुष चांडाल से दूर रहता है। 7.
 
An act related to sin, no matter how great the result of worldly happiness may be, a wise man should never indulge in it. He should stay away from it in the same way as a pious man stays away from a Chandala. 7.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)