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श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 291: पराशरगीता—कर्मफलकी अनिवार्यता तथा पुण्यकर्मसे लाभ  »  श्लोक 6
 
 
श्लोक  12.291.6 
अज्ञानाद्धि कृतं पापं तपसैवाभिनिर्णुदेत्।
पापं हि कर्म फलति पापमेव स्वयं कृतम्।
तस्मात् पापं न सेवेत कर्म दु:खफलोदयम्॥ ६॥
 
 
अनुवाद
यदि अनजाने में कोई पाप हो जाए, तो प्रायश्चित करके उसका नाश कर दो, क्योंकि तुम्हारे द्वारा किए गए पाप का फल दुःख के रूप में मिलता है। इसलिए दुःख देने वाले पाप कर्म कभी मत करो। ॥6॥
 
If you commit a sin unknowingly, destroy it by doing penance, because the sins you commit yield results in the form of sorrows. Therefore, never indulge in sinful acts that give results in sorrow. ॥ 6॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)