Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 12.291.4: जो व्यक्ति बुरे कर्म करके अपने वर्ण से भ्रष्ट हो जाता है, वह कभी भी सम्मान का पात्र नहीं होता। इसके अतिरिक्त, जो व्यक्ति सत्वगुण के कारण सम्मान पाता है, किन्तु फिर राजस कर्म करने लगता है, वह भी सम्मान का पात्र नहीं होता। | mahabharat अध्याय 12.291: पराशरगीता—कर्मफलकी अनिवार्यता तथा पुण्यकर्मसे लाभ । mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
वर्णेभ्यो हि परिभ्रष्टो न वै सम्मानमर्हति।
न तु य: सत्क्रियां प्राप्य राजसं कर्म सेवते॥ ४॥
अनुवाद
जो व्यक्ति बुरे कर्म करके अपने वर्ण से भ्रष्ट हो जाता है, वह कभी भी सम्मान का पात्र नहीं होता। इसके अतिरिक्त, जो व्यक्ति सत्वगुण के कारण सम्मान पाता है, किन्तु फिर राजस कर्म करने लगता है, वह भी सम्मान का पात्र नहीं होता।
A person who commits a bad deed and gets corrupted from his Varna is never worthy of respect. Apart from this, a person who gets respect due to Sattva Guna and then starts performing Rajas' deeds is also not worthy of respect.
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥