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mahabharat 12.291.3: प्रजानाथ! मनुष्य शरीर की आयु सहज नहीं है - यह दुर्लभ वस्तु है, इसे पाकर आत्मा का पतन नहीं करना चाहिए। मनुष्य को सदा पुण्य कर्म करके आत्मा के उत्थान के लिए प्रयत्नशील रहना चाहिए। 3॥   |   mahabharat अध्याय 12.291: पराशरगीता—कर्मफलकी अनिवार्यता तथा पुण्यकर्मसे लाभ   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 291: पराशरगीता—कर्मफलकी अनिवार्यता तथा पुण्यकर्मसे लाभ  »  श्लोक 3
 
 
श्लोक  12.291.3 
आयुर्न सुलभं लब्ध्वा नावकर्षेद् विशाम्पते।
उत्कर्षार्थं प्रयतेत नर: पुण्येन कर्मणा॥ ३॥
 
 
अनुवाद
प्रजानाथ! मनुष्य शरीर की आयु सहज नहीं है - यह दुर्लभ वस्तु है, इसे पाकर आत्मा का पतन नहीं करना चाहिए। मनुष्य को सदा पुण्य कर्म करके आत्मा के उत्थान के लिए प्रयत्नशील रहना चाहिए। 3॥
 
Prajanath! The lifespan of the human body is not easy – it is a rare thing, one should not degrade the soul after attaining it. Man should always strive for the upliftment of the soul by performing virtuous deeds. 3॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)