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mahabharat 12.291.2: जो व्यक्ति इन्द्रियों की बाह्य वृत्तियों से मुक्त (अंतर्मुखी) है और मन को भगवान में समर्पित करके उनकी पूजा करता है, उसकी पूजा सर्वश्रेष्ठ मानी जाती है। ऐसी पूजा केवल विद्वान एवं धर्मनिष्ठ ब्राह्मण के वरद हस्त से ही प्राप्त होती है। ऐसी पूजा समान योग्यता वाले व्यक्तियों को प्राप्त नहीं होती। 2॥   |   mahabharat अध्याय 12.291: पराशरगीता—कर्मफलकी अनिवार्यता तथा पुण्यकर्मसे लाभ   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 291: पराशरगीता—कर्मफलकी अनिवार्यता तथा पुण्यकर्मसे लाभ  »  श्लोक 2
 
 
श्लोक  12.291.2 
सेवाऽऽश्रितेन मनसा वृत्तिहीनस्य शस्यते।
द्विजातिहस्तान्निर्वृत्ता न तु तुल्यात् परस्परात्॥ २॥
 
 
अनुवाद
जो व्यक्ति इन्द्रियों की बाह्य वृत्तियों से मुक्त (अंतर्मुखी) है और मन को भगवान में समर्पित करके उनकी पूजा करता है, उसकी पूजा सर्वश्रेष्ठ मानी जाती है। ऐसी पूजा केवल विद्वान एवं धर्मनिष्ठ ब्राह्मण के वरद हस्त से ही प्राप्त होती है। ऐसी पूजा समान योग्यता वाले व्यक्तियों को प्राप्त नहीं होती। 2॥
 
The worship of a person who is free from the external tendencies of the senses (introverted) and worships God with his mind surrendered to Him, is considered to be the best. Such worship is available only from the blessed hand of a learned and devout Brahmin. It is not achieved by people with similar abilities. 2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)