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mahabharat 12.291.15-16: हे धर्म के जानने वाले राजा जनक! जैसे यहाँ मन से विचार करके और निश्चय करके किए गए स्थूल या सूक्ष्म कर्म अवश्य ही उचित फल देते हैं। इसी प्रकार यदि अनजाने में हिंसा आदि भयंकर पाप किया जाए, तो भी उसका फल मिलता है; केवल अंतर इतना है कि उसका फल जान-बूझकर किए गए कर्म की अपेक्षा बहुत कम होता है॥ 15-16॥   |   mahabharat अध्याय 12.291: पराशरगीता—कर्मफलकी अनिवार्यता तथा पुण्यकर्मसे लाभ   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 291: पराशरगीता—कर्मफलकी अनिवार्यता तथा पुण्यकर्मसे लाभ  »  श्लोक 15-16
 
 
श्लोक  12.291.15-16 
यथा सूक्ष्माणि कर्माणि फलन्तीह यथातथम्।
बुद्धियुक्तानि तानीह कृतानि मनसा सह॥ १५॥
भवत्यल्पफलं कर्म सेवितं नित्यमुल्बणम्।
अबुद्धिपूर्वं धर्मज्ञ कृतमुग्रेण कर्मणा॥ १६॥
 
 
अनुवाद
हे धर्म के जानने वाले राजा जनक! जैसे यहाँ मन से विचार करके और निश्चय करके किए गए स्थूल या सूक्ष्म कर्म अवश्य ही उचित फल देते हैं। इसी प्रकार यदि अनजाने में हिंसा आदि भयंकर पाप किया जाए, तो भी उसका फल मिलता है; केवल अंतर इतना है कि उसका फल जान-बूझकर किए गए कर्म की अपेक्षा बहुत कम होता है॥ 15-16॥
 
O King Janaka, who knows Dharma! Just as the gross or subtle deeds performed here after thinking and deciding with the mind, definitely yield appropriate results. Similarly, if a terrible sin like violence etc. is committed unknowingly, then one also receives its result; the only difference is that its result is much lesser than that of a deed done knowingly.॥ 15-16॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)